ख़िलाफ़त आंदोलन क्या है ?Khilafat Movement, सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में।

Khilafat Movement:- दोस्तों आज के लेख में हम भारत में 1919 से 1920 के मध्य चलाए गए ख़िलाफ़त आंदोलन के बारे में जानकारी देंगे| इस लेख में हम आपको बताएंगे की ख़िलाफ़त आंदोलन किन मुद्दों को लेकर किया गया| इस आंदोलन का पतन कैसे हुआ| इसके अतिरिक्त इस आंदोलन में कौन-कौन से महापुरुषों ने योगदान दिया| दोस्तों खिलाफत आंदोलन क्या है? पहले हम इस बात पर चर्चा करेंगे और जानने की कोशिश करेंगे कि यह ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Andolan) किन कारणों से छेड़ा गया था|

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प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तुर्की ने अपने मित्र राष्ट्रों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था| उस समय पर तुर्की के खलीफा को प्रधान के रूप में देखा जाता था| उस समय तुर्की देश में एक अफवाह फैली हुई थी, कि तुर्कीयों पर अंग्रेजों की सरकार ने अपमानजनक शर्तें लगा रखी हैं| इस शर्त के खिलाफ 1919-20 में अली बंधु मौलाना, आजाद हकीम अजमल, खान हसरत मोहनी आदि ने मिलकर खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement) शुरू किया| इस आंदोलन की तीन मांगी थी-

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  • तुर्की के सुल्तान खलीफा का नियंत्रण मुसलमानों के पवित्र स्थानों पर रहे|
  • इस्लाम की रक्षा के लिए खलीफा का अधिकार रहे|
  • अरब, इराक सीरिया तथा फिलिप्सितान पर मुसलमानों का अधिकार बना रहे|

ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Movement) की नीव:-

अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मुसलमानों का सहयोग लेने के लिए तुर्की देश के प्रति अपना उदार रवैया अपनाया| ब्रिटिश प्रधानमंत्री लायड जार्ज ने तुर्की के मुसलमानों से यह वादा किया कि, हम तुर्की देश को एशिया माइनर और थ्रेस के समृद्धि और प्रसिद्धि भूमि से वंचित करने के लिए युद्ध नहीं लड़ रहे हैं| जो नस्ली दृष्टि से मुख्य रूप से तुर्की है| परंतु बाद में ब्रिटिश के प्रधानमंत्री लायड जार्ज अपने इस वादे से मुकर गए और ब्रिटेन तथा उनके सहयोगियों ने उस्मानिया सल्तनत पर अपमानजनक व्यवहार करना शुरू कर दिया और थ्रेस अपने कब्जे में ले लिया|

जिससे भारत के राजनैतिक चेतना प्राप्त मुसलमान काफी निराश हुए| इसी नाराजगी के कारण भारत के मुसलमानों ने तुर्की के मुसलमानों पर हुए इस अत्याचार का बदला लेने के लिए ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Movement) की शुरुआत की| मौलाना अली शौकत, अली मौलाना, आजाद हसरत मोहानी और अजमल अली ने जल्दी ही एक ख़िलाफ़त आंदोलन कमेटी का गठन किया और संपूर्ण देश में इस आंदोलन को छेड़ दिया| जिसका परिणाम यह हुआ कि राष्ट्र के मुसलमान इस आंदोलन के साथ शामिल हो गए| इसके अलावा कांग्रेस के नेता भी इस आंदोलन में जुड़ गए और इन्होंने संपूर्ण देश में इस आंदोलन को गठित करने के लिए मुसलमानों की सहायता ली|

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ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Andolan) में महात्मा गांधी का आगमन:-

महात्मा गांधी ने भी इस ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Movement ) में अपना सहयोग देने की इच्छा प्रकट की थी| उनके लिए यह आंदोलन हिंदुओं और मुसलमानों के मध्य एकता को मजबूत करने का एक सुनहरा अवसर था| जो लगातार कई वर्षों के प्रयास के बाद मिला |जल्दी ही गांधीजी भी ख़िलाफ़त आंदोलन के उच्च नेताओं के रूप में सामने आए और नवंबर 1919 में गांधी जी को ख़िलाफ़त आंदोलन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया|

एक सम्मेलन में महात्मा गांधी ने मुसलमानों से कहा कि “वे मित्र देशों की विजय के उपलक्ष्य में सार्वजनिक उत्सव में भाग नहीं लेंगे” और उन्होंने धमकी दी कि यदि ब्रिटेन ने तुर्की देश के साथ न्याय नहीं किया तो असहाय आंदोलन और बहिष्कार शुरू कर दिया जाएगा| फजलुल हक, मौलाना आजाद और अकरम ने खिलाफत आंदोलन (Khilafat Andolan) और हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्ष में बंगाल राज्य का दौरा किया हिंदू और मुसलमानों की संयुक्त प्रतिनिधि मंडल 1920 के प्रारंभ में एक वायसराय से मिली | जिन्होंने कहा कि उन्हें अपनी उम्मीद छोड़नी नहीं चाहिए|

जिसके बाद एक प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड गया| परंतु ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज ने अपना उत्तर नहीं बदला| उन्होंने कहा की ईसाइयों के साथ जो व्यवहार किया गया, वही व्यवहार तुर्की के मुसलमानों के साथ भी किया जाएगा| सन 1920 तक, अंग्रेजी हुकूमत ने ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Movement) के नेताओं से यह स्पष्ट रूप से कह दिया था कि वह अब अंग्रेजी सरकार से उम्मीदें ना रखें|

सेव्रेस की संधि तुर्की के विभाजन का सबूत है| इस विभाजन के बाद नेताओं में बहुत ही गुस्सा फैल गया| गांधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ख़िलाफ़त आंदोलन कमेटी को अहिंसा आंदोलन छेड़ने की सलाह दी| इलाहाबाद में 9 जून 1920 को ख़िलाफ़त आंदोलन कमेटी ने गांधी जी के इस सलाह को स्वीकार कर लिया और गांधीजी को ख़िलाफ़त आंदोलन का नेतृत्व करने का जिम्मा सौंप दिया|

खिलाफत आंदोलन (Khilafat Andolan) के पतन का कारण

गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में चार चरणों वाला एक कार्यक्रम बनाया| जिसमें उपाधियों सेना सिविल सर्विसो और पुलिस का बहिष्कार एवं आंतरिक करो को ना देना आदि मांगे शामिल थे|
गांधी जी ने कांग्रेस को ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Andolan) और अन्य प्रकार के मुद्दों पर असहाय आंदोलन ना करने की सलाह दी| इस तरह दोनों संगठन ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया|मुसलमानों ने कहा कि वे सेना में भर्ती नहीं होंगे| इस बात के लिए मौलाना अली और शौकत अली को गिरफ्तार कर लिया गया|

इस बात पर कांग्रेसी नेता ने सारी भारतीयों से अनुरोध किया कि वे किसी भी प्रकार से सरकार की सेवा ना करें| ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को खत्म करने के लिए दमन चक्र का सहारा लिया|खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement) मांगे गए मांगो को पारित करवाने में सफल नहीं रहा और जल्द ही खिलाफत आंदोलन एक आप्रसांगिक आंदोलन हो गया| जिसके बाद तुर्की के मुस्तफा कमाल पाशा ने ख़िलाफ़त आंदोलन का नेतृत्व किया|

मुस्तफा कमाल पाशा ने 1922 में सुल्तान की सत्ता को बर्खास्त होने का वादा कर दिया| जिसके लिए कमाल पाशा ने तुर्की देश के लिए आधुनिकीकरण एवं धर्मनिरपेक्ष स्वरूप देने के लिए कई कदम उठाए और ख़िलाफ़त आंदोलन को समाप्त कर दिया|जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इस्लाम को निकालकर तुर्की राज्य को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित कर दिया| जिससे तुर्की देश में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण, स्त्रियों को व्यापक अधिकार एवं उद्योग धंधों का विकास शुरू हुआ| इन महत्वपूर्ण कदमों से ख़िलाफ़त आंदोलन का पतन हो गया और अपने मूलभूत उद्देश्यों को यह पूरा नहीं कर पाया|किंतु परोक्ष परिस्थितियों से देखा जाए तो यह आंदोलन (Khilafat Andolan) काफी सफल रहा|

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ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Movement) के परिणाम

मुसलमानों का राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होना

ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Andolan) के फलस्वरुप देश के मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल किया गया |इन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ा गया| जिस कारण देश में राष्ट्रवादी उत्साह और उल्लास का माहौल बना हुआ था| इस माहौल को बनाने में ख़िलाफ़त आंदोलनका महत्वपूर्ण योगदान था|

हिंदू मुसलमानों की एकता

ख़िलाफ़त आंदोलन, हिंदू-मुसलमान एकता की भावना को अधिक बल मिला| दोनों प्रकार के समुदायों ने मिलकर विदेशी सरकार से संघर्ष किया और एक दूसरे के भावों को आदर किया|

सांप्रदायिकता को बल प्रदान करना

ऐसा माना जाता है कि राष्ट्रीय आंदोलन द्वारा सिर्फ मुसलमानों की मांगों को उठाना ही नहीं अंततः सांप्रदायिक शक्तियों को मजबूत करना भी था| किंतु इसे राष्ट्रीय आंदोलन द्वारा इस मांग को उठाना गलत था| ख़िलाफ़त आंदोलन के परिणाम स्वरूप मुसलमानों में साम्राज्यवाद विरोधी भावना का प्रचार हुआ |यह आंदोलन खलीफा के प्रति मुसलमानों की चिंता से भी अधिक साम्राज्यवादी विरोधी भावना का ही प्रतिनिधि करता रहा|जिस कारण खिलाफत आंदोलन अपने मांगों को पूरा करने में असफल रहा किंतु परोक्ष परिणाम के लिए लाभदायक सिद्ध हुआ|

ख़िलाफ़त आंदोलन के महत्वपूर्ण नेताओ के नाम:-

  • अली बंधू -मोहम्मद अली और शौकत अली
  • महात्मा गाँधी
  • अब्दुल कलाम आजाद
  • मुस्तफा कमाल पाशा आदि|

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